RV cg news राजू वासवानी रायपुर छत्तीसगढ़ मो.9827916611
हम एक UPI संकट में हैं।
अब आप कहीं भी जाएँ , एक QR कोड आपका इंतज़ार कर रहा है, आपकी जेब खाली करने के लिए।
सब्ज़ीवाले, रिक्शावाले, पान की दुकान, महंगे शोरूम, हर कोई बस एक स्कैन की दूरी पर है।
ना कोई झिझक, ना कोई सोच-विचार। सिर्फ दो टैप… और पैसे निकल गए।
हमेशा ऐसा नहीं था।
पैसे का एक वज़न हुआ करता था। आप उसे महसूस करते थे।
दस रुपए के नोट की बनावट, नए ₹५००के नोट को खर्च करते वक़्त होने वाली हिचक…
बटुआ खोलना और दो बार सोचना, यही था ‘विवेक’।
ये छोटी-सी रुकावट ही हमें बचाती थी।
वो एक पल जिसमें हम खुद से पूछते थे: क्या ये वाकई ज़रूरी है?
UPI ने वो रुकावट हटा दी।
और उसके साथ ही, दिमाग का एक जरूरी भावनात्मक हिस्सा भी चला गया।
Behavioural Scientists इसे कहते हैं “The Pain Of Paying”,
वो हल्की-सी मनोवैज्ञानिक चुभन, जो हमें सोच-समझकर खर्च करने में मदद करती थी।
कैश में वो दर्द था।
UPI में नहीं।
आप अपने महीने का खर्चा ट्रैक करिए और देखेंगे तो आपके होश उड़ जाएंगे।
बेवजह की फूड डिलीवरी, बेकार के लेन-देन, भूली हुई सब्सक्रिप्शन, अचानक किए गए खर्च…
सबकुछ चुपचाप जुड़ते रहे , और आप सुविधा के नशे में सोते रहे।
महीने में एक बार पैसा निकाल कर खर्च करने के लिए पत्नी को देने का मनोविज्ञान बहुत अच्छा था और मितव्ययिता पर आधारित था।
UPI हमें एक झूठा भरोसा देता है, कि हम खर्च कर सकते हैं।
क्योंकि पैसे जाते नहीं दिखते।
अफसोस महसूस नहीं होता।
जबकि अफसोस कोई दुश्मन नहीं, वो एक फीडबैक है।
एक स्मृति।
इसके बिना खर्च का कोई अर्थ नहीं बचता।
और बिना अर्थ के पैसा, जीवन से कनेक्शन तोड़ देता है।
सुविधा की एक कीमत होती है।
वो कीमत है, जागरूकता।
कैशलेस का मतलब अक्सर बेशऊर खर्च होता है।
और एक बार खोई हुई चेतना…
वापस लाना बहुत महँगा पड़ता है।
यह पोस्ट तकनीक को दोष देने के लिए नहीं है बल्कि मैं तो तकनीक को साध कर आगे चलने वाला व्यक्ति हूं।
बल्कि यह पोस्ट आपको याद दिलाने के लिए है कि लेन-देन की रफ्तार, सोच की गति से तेज़ नहीं होनी चाहिए।
UPI रहेगा, और रहना भी चाहिए…
लेकिन वह धीमी-सी आवाज़ भी रहनी चाहिए, जो कहती थी: “फिर से सोचो!”
क्योंकि असली संकट बटुए में नहीं है,
बल्कि खर्च और एहसास के बीच आती शून्य में है।
